सीमा वर्मा (सरू दर्शिनी)

लेखिका :सीमा वर्मा (सरू दर्शिनी)

धरा पर भगवान का रूप है मां,

जननी है जीवनदायिनी हैं मां।।

तेरी ममता का कोई मोल नहीं ,,

दुनियां में सबसे अनमोल है मां ।।

मेरे नन्हे से कदमों को चलना सिखायी ,

जीवन जीने के क्या सलीके हैं मुझे ये बतायी।।

हर बार मुसीबत से मेरे लिये लड़ी,,

चट्टान बन कर हर वक्त मेरे लिये हुई खड़ी ।।

नि:स्वार्थ प्रेम तो सिर्फ मां करती है ,

ज़माने में कहां ऐसी वफा मिलती है।।

हमारे लालन- पालन की खातिर ,,

अपनी खुशियों को हर वक्त कुर्बान करती है।।

मां के नि:स्वार्थ प्रेम का ना करना अपमान ,

करना हर वक्त तुम उनका सम्मान।।

भले ना तुम पूजो पत्थर के भगवान ,,

जीवन के अखाड़े की मां ही है असली पहलवान।।

मां की ममता के आगे हारा है सारा संसार ,

मां के बिना फिका लगता है दुनियां में सबका किरदार ।।

धरा पर भगवान का रूप है मां ,,

जननी है, जीवनदायिनी है मां।।

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